Kabir Ke Dohe In Hindi | संत कबीर दास के दोहे अर्थ सहित

Kabir ke dohe आज की Modern Life में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पंद्रहवीं सदी में थे। Sant Kabir Das आज भी हमें जीवन के बारे में बहुत कुछ सिखाते हैं।

कबीर दास जी का जीवन और उनके दोहे, यदि आप इनको बीते जमाने की बात मानकर नकार देते हैं तो यह एक बहुत बड़ी भूल होगी।

kabir ke dohe hindi
Kabir Ke Dohe

इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि कबीर दास जी बिलकुल भी पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन आज भी बहुत से लोग कबीर दास के जीवन पर और Kabir Amritwani पर Research कर रहे हैं और न जाने कितनी ही Ph.D. अभी तक हो चुकी हैं।

कबीर दास जी ने अपने समय में, जो एक बहुत कठिन समय था, समाज की कुरूतियों पर जोरदार प्रहार किया था और उस समय के लोगों को जीवन जीने की कला सिखाई थी।

Kabir Das ke Dohe आज के लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं हैं। आज भी लोग कबीर के दोहे  (Kabir Ji Ke Dohe) पढ़ते हैं और अपने जीवन में Positive Change लेकर आते हैं।

आप भी कबीर दास जी के दोहे पढ़कर अपना जीवन बदल सकते हैं।

संत कबीर दास जी के दोहे अर्थ सहित

Sant Kabir Das Ke Dohe In Hindi

आज मैं आपको कबीर के दोहे अर्थ सहित बताने जा रहा हूँ। यहाँ आपको जितने भी Kabir Doha बताये जायेंगे, सभी का आपके जीवन पर बहुत Positive Effect होगा। कृपया इन Kabir ke dohe In Hindi को बहुत ध्यान से पढ़ें और इन की शिक्षाओं को अपने जीवन में उतारें–

Kabir Doha #1

नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए,

मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हर रोज शरीर को साफ करने से कुछ नहीं होता जब तक मन का मैल साफ न किया जाये। जिस प्रकार एक मछली हमेशा पानी में रहती है लेकिन फिर भी उसमे से बदबू नहीं जाती, उसी प्रकार रोज चाहें कितना भी नहा कर शरीर साफ कर लो लेकिन जब तक मन को साफ नहीं करोगे तब तक एक सज्जन पुरुष नहीं कहलाओगे।

Kabir Doha #2 

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जब मैं इस संसार में बुराई को खोजने चला तो मुझे कोई भी बुरा न मिला। और जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा इस संसार में कोई नहीं है। अर्थात दूसरों में बुराई खोजने से पहले खुद अपने अंदर झांक कर देख लेना चाहिए।

Kabir Ke Dohe #3

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि बहुत सी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में न जाने कितने लोग मृत्यु के दरवाजे तक पहुँच गए पर कोई भी विद्वान न हो सका। लेकिन यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले अर्थात प्यार का सही रूप पहचान ले तो वही सच्चे अर्थ में ज्ञानी होगा।

Kabir Doha #4

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इस संसार में ऐसे सज्जन लोगों की आवश्यकता है जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता है। जिस प्रकार सूप अच्छे अनाज को बचा लेता है और बेकार अलग उड़ा देता है उसी प्रकार एक अच्छा व्यक्ति अच्छे विचारों को रख लेता है और बेकार को अपने मन से अलग कर देता है।

Kabir Doha #5

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि सज्जन व्यक्ति की जाति न पूछ कर उसके पास मौजूद ज्ञान को समझना चाहिए। जिस प्रकार तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी म्यान का, उसी प्रकार व्यक्ति के ज्ञान का मूल्य होता है चाहें उसकी जाति कुछ भी हो।

Kabir Amritwani #6

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि जब वह दूसरे व्यक्तियों के दोष को देखता है तो बहुत हंसता है और उस समय उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न कोई आदि होता है और न ही कोई अंत होता है।

Kabir Amritwani #7

कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर,

जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि वही इंसान अच्छा है जो दूसरों के दुःख को समझता है। जो व्यक्ति दूसरों के दुःख को नहीं समझता, ऐसा इंसान किसी काम का नहीं होता। अर्थात हमें दूसरों के दुःख को समझना चाहिए और जितनी संभव हो उसकी मदद करनी चाहिए।

Kabir Amritwani #8

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे,

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तुम मुझे रौंद रहे हो, लेकिन एक दिन ऐसा भी आएगा जब तुम मिट्टी में मिल जाओगे, तब मैं तुम्हें रौंदूंगी। अर्थात इस संसार का नियम है कि जो व्यक्ति दूसरों के साथ करता है वैसा ही एक दिन उसे वापस भी मिलता है। इसलिए प्यार दो और प्यार लो।

Kabir Ke Dohe #9

कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये,

ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जब हम पैदा होते हैं तो हम तो रोते हैं लेकिन सभी हँसते हैं और खुशी मनाते हैं। लेकिन इस संसार में रह कर कुछ ऐसा अच्छा कर के जाओ कि जब आपकी मृत्यु का समय आये तो सभी रो रहें हो, दुःख मना रहे हो और आप इस जीवन से संतुष्ट होकर खुश होकर जाएँ।

Kabir Ke Dohe #10

ऐसी बनी बोलिये, मन का आपा खोय,

औरन को शीतल करै, आपौ शीतल होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि ऐसे मीठे और नम्र बचन बोलने चाहिए जो मन को अच्छे लगते हों। ऐसे शब्दों को बोलिये जिससे दूसरे लोग सुखी हों और आप खुद भी सुखी रहें। अर्थात मन के अहंकार को मिटाकर हमेशा दूसरों से अच्छा ही बोलना चाहिए, इसी में सभी का सुख छिपा हुआ है।

Kabir Doha #11

गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह,

आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि आपने जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में लाओ, और जो तुम्हारे हाथ में है उसे परोपकार में लगाओ। इस शरीर के जाने के बाद पश्चात् न कोई बाजार है और न ही कोई व्यापारी है, जो लेना हो सो यही ले लो। अर्थात जो योग्यता तुम्हारे अंदर है उसे बाहर लाओ और जिस योग्य तुम हो, उस योग्यता के अनुसार दूसरों का भला करो।

Kabir Doha #12

धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर,

अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि दान और परोपकार करने से धन नहीं घटना, जिस प्रकार नदी सदैव बहती रहती है और उसमे से जल लेने पर उसका जल नहीं कम होता। कबीर कह गए हैं अगर यकीन न हो तो ऐसा करके स्वयं देख लो। अर्थात अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान आदि का कार्य जरूर करते रहना चाहिए, इससे कोई कमी नहीं आती।

Kabir Doha #13

कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय,

साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग उल्टी-सीधी बात कहते रहते हैं, उन्हें कहने दो, तुम तो अपने गुरु की ही शिक्षा के अनुसार चलो। दुष्ट तथा कुत्तों को उलट कर उत्तर कभी न दो।

Kabir Ke Dohe #14

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय

जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि आप जिस प्रकार का भोजन करते हैं वैसा ही आपका मन हो जाता है और आप जिस प्रकार का पानी पीते हैं वैसी ही आप बचन बोलते हो। अर्थात आपको हमेशा ही अच्छा, शुद्ध और ईमानदारी से कमाए पैसे से खरीदा हुआ भोजन खाना चाहिए और वैसा ही पानी पीना चाहिए।

Kabir Doha #15

बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार,

औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि हे मनुष्य ! तू अपने सद्गुरु की सेवा कर, अच्छे अच्छे कर्म कर तब तुझे  सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। यह जो मनुष्य का जन्म तुम्हें मिला है, वह एक अवसर है, इसे ऐसे ही मत जाने दो क्योकि यह बार बार नहीं मिलता।

Kabir Ke Dohe #16

बनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश,

खाँड़ लादी भुस खात है, बिन सतगुरु उपदेश।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि व्यापारियों के बैल भूसा खाते हुए चारों और घूमते फिरते रहते हैं जबकि उनके पीठ पर मीठा लदा हुआ रहता है। इसी प्रकार इस प्रकार सद्गुरु के उपदेश के बिना आपके अंदर ज्ञान हुए भी आप सांसारिक उलझनों में उलझे हुए घूमते फिरते रहते हैं।

Kabir Ke Dohe #17

तिनका कबहूँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहूँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि एक छोटे तिनके को छोटा समझ के उसकी निंदा कभी न करो, जिस प्रकार वह पैरों के नीचे आकर मिट्टी में मिल जाता हैं वैसे ही वह उड़कर यदि आँख में चला जाये तो बहुत बड़ा घाव या दर्द देता हैं।

Kabir Amritvani #18

धीरे–धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति आम के पेड़ को रोज बहुत सा पानी दे और उस पेड़ के नीचे आम आने की राह में बैठा रहे तो भी आम नहीं आएंगे क्योंकि आम तो केवल ऋतु में ही आते हैं, वैसे ही धैर्य रखने से समय आने पर सब काम हो जाते हैं।

Kabir Amritvani #19

माला फेरत जग भया, फिरा न मन का फेर,

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति चाहें कितना ही समय तक हाथ में मोती की माला लेकर घुमाता हैं लेकिन उसका भाव या स्वभाव नहीं बदलता। कबीरदास ऐसे लोगों को एक सलाह देते हैं कि हाथ में मोतियों की माला को फेरना छोड़ दो और अपने मन के मोती को बदलो। अर्थात बाहरी आडम्बर करने से आपका स्वभाव नहीं बदलेगा, उसके लिए तो आपको अपने मन को या अपनी आदतों को बदलना पड़ेगा।

Kabir Amritvani #20

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग कोशिश करते हैं, वे कुछ न कुछ जरूर पा ही लेते हैं जिस प्रकार कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ न कुछ जरूर ले कर आता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय के कारण किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं प्राप्त कर पाते। अर्थात डर छोड़ कर जो करना चाहते हो उसकी कोशिश में लग जाओ।

Kabir Doha #21

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि वाणी एक अनमोल रत्न है। यह बात वही जानता है जो सही तरीके से बोलना जानता है। ऐसा व्यक्ति शब्दों को दिल के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है। अर्थात शब्द अनमोल होते हैं जो अपना प्रभाव जरूर डालते हैं, उन्हें सोच समझकर ही बोलना चाहिए।

Kabir Doha #22

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप,

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि न तो बहुत ज्यादा बोलना अच्छा होता है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही अच्छा होता है। जिस प्रकार बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं होती और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं होती है। अर्थात अधिकता हर चीज की बुरी होती है।

Kabir Doha #23

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग हमारी निंदा या बुराई करते हैं, उन्हें अधिक से अधिक अपने पास ही रखना चाहिए क्योंकि वह तो बिना साबुन और बिना पानी के हमारी सभी कमियां और दोष बता कर हमारे स्वभाव को निर्मल और साफ़ कर देते हैं। अर्थात जो लोग हमारी बुराई करते हैं, वह हमारी उन कमियों को भी बता देते हैं जो हमें पता नहीं होती। अगर हमें यह पता चल जाएँ तो हम इन्हें सुधार सकते हैं।

Kabir Ke Dohe #24

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इस संसार में मनुष्य का जन्म बहुत ही मुश्किल से मिलता है। यह मनुष्य शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जिस प्रकार किसी पेड़ से कोई पत्ता यदि टूट जाए तो वह दोबारा कभी पेड़ पर नहीं लग सकता। अर्थात मानव जन्म अनमोल है और इसे हमेशा अच्छे और सकारात्मक कार्यों में ही लगाना चाहिए।

Kabir Ke Dohe #25

कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई,

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि समुद्र की लहर के साथ बाहर बहुत से मोती आकर बिखर जाते हैं। बगुला उनका महत्ता नहीं जानता है और कोई प्रतिक्रिया नहीं करता परन्तु हंस उन्हें चुन चुन कर खा रहा है क्योंकि वह मोतियों के महत्व को जानता है। अर्थात किसी भी वस्तु का महत्व केवल उसका जानकार ही जानता है।

Kabir Ke Dohe #26

जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई,

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो उस गुण की कीमत होती है। लेकिन जब ऐसा गाहक नहीं मिलता तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है। अर्थात आपकी अच्छाई तभी काम की है जब उसको परखने वाले के सामने किया जाये लेकिन जो आपकी अच्छाई को नहीं समझता, वहां आपकी अच्छाई बेकार चली जाती है।

Kabir Ke Dohe #27

संत ना छाडै संतई, कोटिक मिले असंत,

चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटत रहत भुजंग।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट लोग मिल जाएँ लेकिन फिर भी वह अपने अच्छे स्वभाव को कभी नहीं छोड़ता। जिस प्रकार चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं लेकिन फिर भी वह अपनी शीतलता या खुश्बू बिखेरना नहीं छोड़ता। अर्थात आप चाहें कैसे भी माहौल में रहें लेकिन कभी अपनी अच्छाई को न छोड़ें।

Kabir Ke Dohe #28

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ,

जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि संसार के माहौल में रहने वाले व्यक्ति का शरीर पक्षी जैसा बन गया है और जहां उसका मन जाता है, उसका शरीर भी उड़कर वहीं पहुँच जाता है। जो जैसे लोगों के साथ रहता है वह वैसा ही बन जाता है और वैसा ही फल प्राप्त करता है। अर्थात आपको हमेशा अच्छे लोगों की संगत में रहना चाहिए।

Kabir Ke Dohe #29

आछे / पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत,

अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि देखते ही देखते सब अच्छे दिन, अच्छा समय बीतता चला गया और तुमने ईश्वर का ध्यान भी नहीं किया, उनसे हित अर्थात प्यार नहीं किया। अब समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा जब तुम पहले सचेत ही न थे। यह ठीक उसी तरह है जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली न करे और देखते ही देखते पक्षी उसकी फसल बर्बाद कर चले जाएँ और बाद में उसे पछतावा हो।

Kabir Ke Dohe #30

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय,

हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि रात सो सो कर बर्बाद कर दी और दिन में भोजन करने से ही फुर्सत नहीं मिली। यह मनुष्य का जन्म हीरे के सामान अनमोल है, इसे तुम व्यर्थ न जाने दो। यदि तुमने इसे बेकार जाने दिया तो इसकी कोई कीमत नहीं बचेगी। अर्थात जीवन अमूल्य है इसे अच्छे कामो में ही लगाएं तभी इसकी सार्थकता बनी रहेगी।

कबीर के दोहे #31

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।

 पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर ॥

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि खजूर के पेड़ के जैसा बड़ा होने का क्या फायदा जो न तो किसी को ठीक से छाँव दे पाता है और न ही उसके फल मिल पाते हैं क्योंकि वह बहुत दूर लगे होते हैं। अर्थात ऐसे बनो कि किसी के काम आ सको।

कबीर के दोहे #32

कबीर प्रेम न चक्खिया, चक्खि न लिया साव,

सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा ही नहीं, उसका स्वाद ही नहीं लिया वह उस मेहमान के समान है जो सूने अर्थात निर्जन घर में जिस प्रकार आता है उसी प्रकार चला भी जाता है, और उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता। अर्थात यदि इस संसार में आये हो तो ईश्वर से या लोगों से प्रेम करो।

कबीर के दोहे #33

लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार,

कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि घर बहुत दूर है और रास्ता बहुत लंबा है। रास्ता बहुत डरावना है और उसमें अनेक चोर और ठग हैं। अर्थात इस संसार में अनेक परेशानियां है, जीवन बहुत कठिन है, इस संसार का आकर्षण हमें भरमाता रहता है, ऐसे में ईश्वर के दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो? अर्थात इस संसार में बहुत सी परेशानियों के चलते मन वह नहीं कर पाता जो वह चाहता है। ऐसे में हमें सही दिशा में मेहनत करनी चाहिए और सफलता को प्राप्त करना चाहिए।

कबीर के दोहे #34

मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै,

काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि यह मन सभी बातों को जानता है और जानते हुए भी अवगुणों में फंस जाता है। यह किस तरह की कुशलता है जब दीपक को हाथ में पकड़े हुए भी यदि कुंए में गिर जाओ। अर्थात ईश्वर ने आपको इतनी समझ दी है कि क्या अच्छा है? और क्या बुरा है?, की पहचान कर सको तो आप यदि समझदार होते हुए भी बुरी संगती में पड़ जाते हो तो आपकी समझदारी किस काम की?

Kabir Ke Dohe #35

करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय,

बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि यदि तुम कुछ अच्छा कर सकते थे तो उस समय क्यों चुप बैठे रहे? और अब जब कुछ अच्छा न कर सके तो अब क्यों पछताते हो? यह इसी तरह है जिस प्रकार जब कोई बबूल का पेड़ लगाए और आम लगने की प्रतीक्षा करे। जब बबूल बोया है तो आम कहाँ से मिलेगा?

Kabir Ke Dohe #36

कबीर चन्दन के निडै नींव भी चन्दन होइ,

बूडा बंस बड़ाइता यों जिनी बूड़े कोइ।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि यदि चंदन के पेड़ के पास नीम का पेड़ हो तो वह नीम का पेड़ भी कुछ प्रभाव ले लेता है। लेकिन बांस अपनी लम्बाई, अपने बडेपन के कारण डूब जाता है। इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए। अर्थात संगति का अच्छा प्रभाव जरूर ग्रहण करना चाहिए। केवल अपने घमंड में ही नहीं रहना चाहिए।

Kabir Dohe #37

मूरख संग न कीजिए, लोहा जल न तिराई,

कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मूर्ख का साथ मत रहो, मूर्ख लोहे के समान है जो जल में तैर नहीं पाता  और डूब जाता है। संगति का प्रभाव इतना पड़ता है कि आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर बन जाती है, सीप के अन्दर गिर कर मोती बन जाती है और सांप के मुँह में पड़कर विष बन जाती है। अर्थात अपनी संगती हमेशा अच्छी रखो।

Kabir Dohe #38

मन के हारे हार है मन के जीते जीत,

कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जीवन में विजय और पराजय केवल मन पर निर्भर करती हैं। यदि मनुष्य मन से हार गया तो पराजय निश्चित है और यदि उसने मन को जीत लिया तो जीत निश्चित है। ईश्वर को भी आप मन के विश्वास से ही प्राप्त कर सकते हैं। यदि मन में विश्वास है तो वह जरूर मिलेगा और यदि नहीं है तो क्यों मिलेगा?

Kabir Dohe #39

जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं,

प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ और जब अहम समाप्त हुआ तभी ईश्वर का साक्षात्कार हो गया। प्रेम की गली इतनी पतली होती है कि उसमे दो चीजें नहीं समा सकती। या तो उसमे ईश्वर आ सकता है या अहंकार। यदि इस गली से अहंकार निकाल दोगे तो ईश्वर स्वयं आ जायेगा।

कबीर के दोहे मीठी वाणी #40

पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट,

कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि लोग पढ़ पढ़ कर पत्थर के समान हो जाते हैं और लिख लिख कर ईंट के समान हो जाते हैं जबकि ज्ञान से बड़ा प्रेम होता है और प्रेम की एक भी बूँद उस पर नहीं पड़ती। अर्थात – बहुत ज्ञान हासिल करके यदि मनुष्य पत्थर सा कठोर हो जाता है और ईंट जैसा निर्जीव हो जाता है। ऐसे में उसने क्या अच्छा पाया? इससे क्या लाभ? जबकि प्रेम की एक बूँद व्यक्ति को निर्मल और सजीव बना देती है। अर्थात ज्ञान जरुरी है तो प्रेम सबसे जरुरी है।

कबीर के दोहे मीठी वाणी #41 

एक ही बार परखिये ना वा बारम्बार,

बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार।

अर्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि किसी व्यक्ति को परखना है तो बस केवल एक बार में ही परख लेना चाहिए, इससे उसे बार बार परखने की आवश्यकता नहीं होगी। जिस प्रकार यदि रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर नहीं होगी, इसी प्रकार दुर्जन को बार बार भी परखो तब भी वह अपनी दुष्टता से भरा हुआ वैसा ही मिलेगा जबकि सज्जन की परख एक बार में ही हो जाती है।

कबीर दास जी के जीवन के बारे में यहाँ पढ़े- कबीर दास जी का जीवन परिचय

कबीर दास जी के दोहे सुनने के लिए यहाँ जाएँ- कबीर दास जी की अमृतवाणी

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